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...Bean-bag की आगोश में ...

Posted: Friday, February 13, 2009 by Vikrant in Labels:
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ज़ो स्वाद तुम्हारे हाथ की
सूखी रोटी और चटनी में था,
वह लाख तसल्लियों के बाद भी
'चीज-बर्स्ट पिज्जा' में नहीं आता।

तेरी फ़टी-पुरानी साड़ी के आँचल में
जो सुकून मिला करता था,
वह आराम आज 'बीन-बैग' में
समा जाने से भी नहीं आता।

आम की टहनियों में बँधे
'टायर' के झूले पे जो चेहरा खिला था,
एच.एन.की ट्वाय-कारों की टक्करों में
उसका एक अंश भी न पा सका।

गंगा को स्पर्श कर छत से गुजरती
ठंडी बयार ने जो झपिकयाँ दी
कमरे के ए.सी. की 'कंडीशंड'
हवाएं वो सुकून न दे पायीं।


एक प्रश्न करता हूँ स्वयं से कि
क्यूँ कल का स्वच्छन्द मन आज
बँध चुका है सांसारिक पाश में।

एक प्रश्न करता हूँ स्वयं से कि
क्यूँ शामिल हैं हमारे कदम भी
आधुनिकता की अंधी दौड़ में।

और ऐसे ही कई सवालों से जूझता
एक और प्रश्न करता हूँ स्वयं से कि
क्यूँ सिर्फ सवाल-दर-सवाल किये जाता हूँ।

और फिर जवाबों की तलाश में
बीन-बैग पे करवट-दर-करवट
पूरी रात आँखों मे काट जाता हूँ।

...परिणाम

Posted: by Vikrant in Labels:
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यह कोई सत्ता का संघर्ष नहीं
इसमें चीखें तो हैं किन्तु चिर शांत
रक्त तो बहते हैं,पर मृत्यु नहीं होती I

टक्कर तलवारों
की नहीं
विचारों की होती है I
और,घायल हर क्षण
एक ही ह्रदय होता है I

इक लड़ाई
जो वर्षों से चली आ रही है
मुझमें और मुझ ही में I

परिणाम शायद न है
और न मैं सोच पाता हूँ I
वैसे भी यह मेरा काम नहीं I
न सोचा था इसे
कुरुक्षेत्र के मैदान ने
और न ही परातंत्रता की वेदना झेलती
संपूर्ण भारत-भूमि ने I

किन्तु एक आशा
जो कुरुक्षेत्र की भी थी
और भारत-भूमि को भी,
मैं भी करता हूँ
कि
'परिणाम हो,परिणाम हो'I

...कौन हो तुम कामिनी !

Posted: by Vikrant in Labels:
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सुमन ने मुस्कान सीखी
कोकिला ने तान सीखी
हंस ने सीखी तुम्ही से
मंद गति गजगामिनी
कौन हो तुम कामिनी !

सादगी दर्पण की सी है
स्वप्न स्वर्गों के कपोत
केश नीरद की धरोहर
नयन चंचल दामिनी
कौन हो तुम कामिनी !

...मिलोगे मुझसे ?

Posted: Sunday, February 8, 2009 by Vikrant in Labels:
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मिलोगे मुझसे?
शायद नहीं जानते मुझे
इसलिए मिलना चाह्ते हो
यहाँ एक राही पड़ा है
थका हारा अकेला मजबूर
राह तकता मौत की
क्यूंकि अब चल न पायेगा
एक भी कदम.
और दूसरी कोई मंजिल नहीं
जो खुद चलकर आती हो
मुसाफिर तक.
हमारी दुनिया मे
मुसाफिर नहीं
रास्ते चला करते है
और शायद मंजिल भी.
वो देखो चली आ रही है.
अब कहो,मिलोगे मुझसे??

'ना' नहीं कह पाओगे
इन्सान हो न.
देखा है मैने भी
तुम्हारी तन्हाईयो को
झूठी शान
भूखे मान को
इंसानियत को और
इंसानियत की धज्जियों को.
एक धुन्धला चश्मा जो सबकी
आँखों पे लगा है.
हटा न पाओगे
क्यूंकि हिम्मत नहीं है
सच्चाई दिख जायेगी,है न!
तो
फिर मिलोगे कैसे मुझसे???

नहीं दिखता मै कुहासे मे
हटाओ ये
धुआँ
या फिर उसे
जिससे उठ रहा ये धुआँ
जानता हूँ मुश्किल है
नामुमिकन तो
नहीं
एक कदम तो बढ़ाओ
तो पाओगे कि शायद
साथ ही तो हूँ मै तुम्हारे.

अब कहो,मिलोगे मुझसे?