...मिलोगे मुझसे ?

Posted: Sunday, February 8, 2009 by Vikrant in Labels:
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मिलोगे मुझसे?
शायद नहीं जानते मुझे
इसलिए मिलना चाह्ते हो
यहाँ एक राही पड़ा है
थका हारा अकेला मजबूर
राह तकता मौत की
क्यूंकि अब चल न पायेगा
एक भी कदम.
और दूसरी कोई मंजिल नहीं
जो खुद चलकर आती हो
मुसाफिर तक.
हमारी दुनिया मे
मुसाफिर नहीं
रास्ते चला करते है
और शायद मंजिल भी.
वो देखो चली आ रही है.
अब कहो,मिलोगे मुझसे??

'ना' नहीं कह पाओगे
इन्सान हो न.
देखा है मैने भी
तुम्हारी तन्हाईयो को
झूठी शान
भूखे मान को
इंसानियत को और
इंसानियत की धज्जियों को.
एक धुन्धला चश्मा जो सबकी
आँखों पे लगा है.
हटा न पाओगे
क्यूंकि हिम्मत नहीं है
सच्चाई दिख जायेगी,है न!
तो
फिर मिलोगे कैसे मुझसे???

नहीं दिखता मै कुहासे मे
हटाओ ये
धुआँ
या फिर उसे
जिससे उठ रहा ये धुआँ
जानता हूँ मुश्किल है
नामुमिकन तो
नहीं
एक कदम तो बढ़ाओ
तो पाओगे कि शायद
साथ ही तो हूँ मै तुम्हारे.

अब कहो,मिलोगे मुझसे?

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